कलामे फ़ैज़

यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले...

Written by इरफ़ान on Friday, August 31, 2007


ये पूछना ज़रूरी नहीं है कि जिस तरह फ़ैज़ को पाकिस्तान का हर बड़ा गायक गाता है उस तरह फ़ैज़ का समकालीन कौन है जिसे उसके देश का हर बड़ा गायक गाता है.
सुनिये मेहंदी हसन की गाई ये बहुत बार सुनी जा चुकी ग़ज़ल.






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  1. 1 नुक्ताचीनी: Responses to “ गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले... ”

  2. By shefali on September 1, 2007 2:30 PM

    hi, this is a beutiful all time great ghazal sung by mehandi hasan sahab. i appreciate your efforts to showcase faiz.
    inayatullah

फैज़ अहमद फैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

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