अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़ुबाँ ठहरी है
जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है
आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम
अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है
है ख़बर गर्म के फिरता है गुरेज़ाँ नासेह
गुफ़्तग आज सर-ए-कू-ए-बुताँ ठहरी है
है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरिअन का दहन
निगाह-ए-शौक़ घड़ी भर को यहाँ ठहरी है
वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबक गुज़री है
हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गराँ गुज़री है
बिखरी एक बार तो हाथ आई कब मौज-ए-शमीम
दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है
दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल्चीं भी
बू-ए-गुल ठहरी न बुल-बुल की ज़बाँ ठहरी है
आते आते यूँ ही दम भर को रुकी होगी बहार
जाते जाते यूँ ही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है
हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में इजाद
"फ़ैज़" गुलशन में वो तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है
Sunday, September 30, 2007
अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़ुबाँ ठहरी है
Thursday, September 20, 2007
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर हैं हम
इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज़दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरे है
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
और अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है
जिस में हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के थोड़े हैं
अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पर यूं ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बेनाम गरांबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तेरी हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़.
Thursday, September 13, 2007
उन दुखी माओं के नाम
पोस्ट में मौजूद फ़ोटो नैय्यरा नूर की ही है.
Monday, September 10, 2007
मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूं हो जाये
यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमखाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Thursday, September 6, 2007
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
यहां जो प्लेयर है उस पर शुरू में आप सुनेंगे फ़ैज़ साहब की आवाज़ में नक्श-ए-फ़रियादी से पांच नज़्में और कुछ इब्तेदाई अशआर-
1.रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
2.फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
3.चंद रोज़ और मेरी जान
4.बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
5.मौज़ू-ए-सुख़न
6.हम लोग
इस पेशकश के आख़ीर में आप नूरजहां से सुनेंगे...मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
ये पाकिस्तान में बनी फ़िल्म क़ैदी (1962) से लिया गया है. इसे देखते हुए सुनने के लिये यहां जाएं.
Wednesday, September 5, 2007
ख़ुदा वो वक़्त न लाये
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि सोग़वार हो तू
सुकूं की नींद तुझे भी हराम हो जाये
तेरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाये
तेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाये
ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा
हुजूम-ए-यास से बेताब होके रह जाये
वफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब हो के रह जाये
तेरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाये
ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरा
तवील रातों में तू भी क़रार को तरसे
तेरी निगाह किसी ग़मगुसार को तरसे
ख़िज़ां रसीदा तमन्ना बहार को तरसे
कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्तां पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे एतमाद करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये
वो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी है
वो आंख जिस को तेरा इन्तज़ार अब भी है
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Tuesday, September 4, 2007
पास रहो

फ़ैज़ ख़ुद भले ही बड़े बेमन से अपनी रचनाएं पढ़ते रहे हों लेकिन यारों ने उन्हे पढ़ने की मिसालें क़ायम की हैं.
पाकिस्तान के मशहूर अदाकार बुज़ुर्गवार ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ में सुनिये ये नज़्म.

