कलामे फ़ैज़

यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

उन दुखी माओं के नाम

Written by इरफ़ान on Thursday, September 13, 2007


इंतेसाब और कई दूसरी रचनाएं सुनिये नैय्यरा नूर की आवाज़ में.

इसमें दो male आवाज़ें खुर्शीद सिद्दीक़ी और शहरयार की हैं.









पोस्ट में मौजूद फ़ोटो नैय्यरा नूर की ही है.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 नुक्ताचीनी: Responses to “ उन दुखी माओं के नाम ”

  2. By Manish on September 13, 2007 12:59 PM

    शुक्रिया ! इसे यहाँ बाँटने के लिए

फैज़ अहमद फैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

फीड पाएं

रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:
अपना ई मेल लिखें :