कलामे फ़ैज़

यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

ख़ुदा वो वक़्त न लाये

Written by Reyaz-ul-haque on Wednesday, September 05, 2007

ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि सोग़वार हो तू
सुकूं की नींद तुझे भी हराम हो जाये
तेरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाये
तेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाये

ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा
हुजूम-ए-यास से बेताब होके रह जाये
वफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब हो के रह जाये
तेरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाये

ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरा
तवील रातों में तू भी क़रार को तरसे
तेरी निगाह किसी ग़मगुसार को तरसे
ख़िज़ां रसीदा तमन्ना बहार को तरसे

कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्तां पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे एतमाद करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये

वो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी है
वो आंख जिस को तेरा इन्तज़ार अब भी है

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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  1. 0 नुक्ताचीनी: Responses to “ ख़ुदा वो वक़्त न लाये ”

फैज़ अहमद फैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

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