पास रहो
Written by इरफ़ान on Tuesday, September 04, 2007
फ़ैज़ ख़ुद भले ही बड़े बेमन से अपनी रचनाएं पढ़ते रहे हों लेकिन यारों ने उन्हे पढ़ने की मिसालें क़ायम की हैं.
पाकिस्तान के मशहूर अदाकार बुज़ुर्गवार ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ में सुनिये ये नज़्म.
यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

फ़ैज़ ख़ुद भले ही बड़े बेमन से अपनी रचनाएं पढ़ते रहे हों लेकिन यारों ने उन्हे पढ़ने की मिसालें क़ायम की हैं.
पाकिस्तान के मशहूर अदाकार बुज़ुर्गवार ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ में सुनिये ये नज़्म.
0 नुक्ताचीनी: Responses to “ पास रहो ”