कलामे फ़ैज़

यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

Written by Reyaz-ul-haque on Monday, September 10, 2007

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूं हो जाये
यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमखाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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  1. 1 नुक्ताचीनी: Responses to “ मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग ”

  2. By yunus on September 10, 2007 11:10 PM

    वाह तुम नाहक शीशे चुन चुनकर दामन से लगाए बैठे हो
    शीशों का मसीहा कोई नहीं क्यार आस लगाए बैठे हो ।
    फैज़ अहमद फैज़ को सलाम

फैज़ अहमद फैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

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