कलामे फ़ैज़

यही दाग थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये (अभी यह ब्लॉग टेस्ट की प्रक्रिया में है.)

आये कुछ अब्र कुछ शराब आये

Written by Reyaz-ul-haque on Saturday, September 01, 2007

बेगम अख्तर की आवाज़ में फ़ैज़ की एक खूबसूरत गज़ल -आये कुछ अब्र कुछ शराब आये.

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फैज़ अहमद फैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

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