नहीं निगाह में मंजिल

Posted by Reyaz On April - 26 - 2009

किसी तरह तो जमे बज़्म, मैकदेवालों नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल किसी के वाद-ए-फर्दा से गुफ्तगू ही सही दयारे-गैर में महरम अगर नहीं कोई तो फ़ैज़ ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सही

बहार आई

Posted by TheBlogTemplates On April - 19 - 2009

बहार आई तो जैसे एक बार लौट आए हैं फिर अदम से वो ख्वाब सारे, शबाब सारे जो तेरे होंठों पे मर मिटे थे जो मिट के हर बार फिर जिए थे निखर गये हैं गुलाब सारे जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं जो तेरे उश्शाक का लहू हैं

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अब वही हर्फ़-ए-जुनूँ सब की ज़ुबाँ ठहरी है
जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है

आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम
अब वही दुश्मन-ए-दीं राहत-ए-जाँ ठहरी है

है ख़बर गर्म के फिरता है गुरेज़ाँ नासेह
गुफ़्तग आज सर-ए-कू-ए-बुताँ ठहरी है

है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरिअन का दहन
निगाह-ए-शौक़ घड़ी भर को यहाँ ठहरी है

वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबक गुज़री है
हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गराँ गुज़री है

बिखरी एक बार तो हाथ आई कब मौज-ए-शमीम
दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है

दस्त-ए-सय्याद भी आजिज़ है कफ़-ए-गुल्चीं भी
बू-ए-गुल ठहरी न बुल-बुल की ज़बाँ ठहरी है

आते आते यूँ ही दम भर को रुकी होगी बहार
जाते जाते यूँ ही पल भर को ख़िज़ाँ ठहरी है

हम ने जो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ की है क़फ़स में इजाद
"फ़ैज़" गुलशन में वो तर्ज़-ए-बयाँ ठहरी है

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त

Posted by Reyaz-ul-haque On Thursday, September 20, 2007 2 comments
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पर मजबूर हैं हम
इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अज़दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम

जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरे है
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
और अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है
जिस में हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं

लेकिन अब ज़ुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के थोड़े हैं

अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पर यूं ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बेनाम गरांबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है

ये तेरी हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़.

उन दुखी माओं के नाम

Posted by इरफ़ान On Thursday, September 13, 2007 1 comments

इंतेसाब और कई दूसरी रचनाएं सुनिये नैय्यरा नूर की आवाज़ में.

इसमें दो male आवाज़ें खुर्शीद सिद्दीक़ी और शहरयार की हैं.









पोस्ट में मौजूद फ़ोटो नैय्यरा नूर की ही है.
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूं हो जाये
यूं न था मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमखाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
यहां जो प्लेयर है उस पर शुरू में आप सुनेंगे फ़ैज़ साहब की आवाज़ में नक्श-ए-फ़रियादी से पांच नज़्में और कुछ इब्तेदाई अशआर-
1.रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
2.फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
3.चंद रोज़ और मेरी जान
4.बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
5.मौज़ू-ए-सुख़न
6.हम लोग

इस पेशकश के आख़ीर में आप नूरजहां से सुनेंगे...मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
ये पाकिस्तान में बनी फ़िल्म क़ैदी (1962) से लिया गया है. इसे देखते हुए सुनने के लिये यहां जाएं.








ख़ुदा वो वक़्त न लाये

Posted by Reyaz-ul-haque On Wednesday, September 05, 2007 0 comments
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि सोग़वार हो तू
सुकूं की नींद तुझे भी हराम हो जाये
तेरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाये
तेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाये

ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा
हुजूम-ए-यास से बेताब होके रह जाये
वफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब हो के रह जाये
तेरा शबाब फ़क़त ख़्वाब हो के रह जाये

ग़ुरूर-ए-हुस्न सरापा नियाज़ हो तेरा
तवील रातों में तू भी क़रार को तरसे
तेरी निगाह किसी ग़मगुसार को तरसे
ख़िज़ां रसीदा तमन्ना बहार को तरसे

कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्तां पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे एतमाद करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये

वो दिल कि तेरे लिए बे-क़रार अब भी है
वो आंख जिस को तेरा इन्तज़ार अब भी है

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

पास रहो

Posted by इरफ़ान On Tuesday, September 04, 2007 0 comments

फ़ैज़ ख़ुद भले ही बड़े बेमन से अपनी रचनाएं पढ़ते रहे हों लेकिन यारों ने उन्हे पढ़ने की मिसालें क़ायम की हैं.
पाकिस्तान के मशहूर अदाकार बुज़ुर्गवार ज़िया मोहिउद्दीन की आवाज़ में सुनिये ये नज़्म.






आये कुछ अब्र कुछ शराब आये

Posted by Reyaz-ul-haque On Saturday, September 01, 2007 0 comments
बेगम अख्तर की आवाज़ में फ़ैज़ की एक खूबसूरत गज़ल -आये कुछ अब्र कुछ शराब आये.

रकीब से

Posted by Reyaz-ul-haque On Saturday, September 01, 2007 0 comments
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था

आशना हैं तेरे क़दमों से वह राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवां गुज़रे हैं जिनसे इसी र’अनाई के
जिसकी इन आंखों ने बेसूद इबादत की है

तुझ से खेली हैं वह मह्बूब हवाएं जिन में
उसके मलबूस की अफ़सुरदा महक बाक़ी है
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेह्ताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है

तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंट
ज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझ पे उठी हैं वह खोई खोई साहिर आंखें
तुझको मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हमने

हम पे मुश्तरका हैं एह्सान ग़मे उल्फ़त के
इतने एह्सान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं
हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊं तो समझा न सकूं

आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास ओ हिर्मां के दुख दर्द के म’आनि सीखे
ज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे

जब कहीं बैठ के रोते हैं वह बेकस जिनके
अश्क आंखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
नातवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तौले हुए मन्डलाते हुए आते हैं

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ऐ गमे दोस्त ! तू कहां है आज

Posted by Reyaz-ul-haque On Saturday, September 01, 2007 0 comments
दिल रहीने गमे जहां है आज
हर नफ़स तिश्ना-ए-फ़ुगां है आज
सख्त वीरां है महफ़िले-हस्ती
ऐ गमे दोस्त ! तू कहां है आज.

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़